

“ये तस्वीरें किसी भविष्य की नहीं हैं…
ये आज के भारत की सच्चाई हैं।
सवाल ये नहीं है कि हवा ज़हरीली क्यों हो रही है,
सवाल ये है—
हमारी ढाल कहाँ टूट गई?
उस ढाल का नाम है—
अरावली।”
“अरावली…
दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक।
जब हिमालय भी जन्म नहीं था,
तब अरावली धरती की रीढ़ बन चुकी थी।
करीब 1000 किलोमीटर लंबी,
गुजरात से राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली—
ये सिर्फ पहाड़ नहीं, ये उत्तर भारत का जीवन-रक्षक सिस्टम है।”
“अरावली ने वो काम किए—
जो कोई सरकार नहीं कर पाई।
थार रेगिस्तान को दिल्ली तक आने से रोका।
बारिश के पानी को ज़मीन में समा कर भूजल को जिंदा रखा।
हवा को साफ रखा, तापमान को संतुलित रखा।
अगर अरावली नहीं होती, तो दिल्ली आज रेगिस्तान की दहलीज़ पर खड़ी होती।”
संकट की शुरुआत
“लेकिन फिर आया— तथाकथित ‘विकास’।
पहाड़ों को पत्थर समझा गया, और जंगलों को ज़मीन।
अवैध खनन, रियल एस्टेट, फार्महाउस, और साइलेंट परमिशन।
अरावली को काटा गया, और बदले में हमें क्या मिला?
ज़हरीली हवा, सूखा और डर।”
सवाल
“आज सवाल उठता है— क्या अरावली सिर्फ फाइलों में बची है?
जब सुप्रीम कोर्ट ने संरक्षण की बात कही, तो ज़मीन पर खनन कैसे चलता रहा?
अगर अरावली खत्म हुई, तो क्या सरकार हर घर में ऑक्सीजन सिलेंडर देगी?
क्या पानी के लिए टैंकर ही हमारी नीति है?”
विकास ज़रूरी है लेकिन विनाश की कीमत पर नहीं।”
“शायद आप सोचें— ‘अरावली तो दूर है।’
लेकिन जब आपके शहर में पानी नीचे जाता है,
तो वजह अरावली है।
जब गर्मी 48 डिग्री पार करती है, तो वजह अरावली है।
अरावली बचेगी, तभी हम बचेंगे।
अगर अरावली बोल पाती, तो शायद कहती—
‘मैंने तुम्हें सदियों तक बचाया,
और तुम मुझे कुछ सालों में मिटा रहे हो।’
ये लड़ाई पर्यावरण की नहीं, ये लड़ाई भविष्य की है।
“अब भी वक्त है।
सवाल पूछने का। आवाज़ उठाने का।
क्योंकि अगर अरावली नहीं बची— तो इतिहास लिखेगा—
‘इंसानों ने विकास चुना,
और जीवन खो दिया।’”
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